हरिद्वार। देवभूमि उत्तराखंड के प्रमुख जिलों में शुमार हरिद्वार में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। जिला अस्पताल की मोर्चरी में शवों को सुरक्षित रखने की पूरी व्यवस्था चरमरा गई है। मोर्चरी में लगे सभी सात डीप फ्रीज़र खराब हो चुके हैं और प्रशासन की लापरवाही का आलम यह है कि 11 शव खुले में रखे जाने पर मजबूर हैं।
इन शवों से उठती तेज़ दुर्गंध ने अस्पताल के पूरे परिसर को प्रभावित कर दिया है। न केवल तीमारदार, बल्कि डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारी भी स्थिति से बेहद परेशान हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतने संवेदनशील विभाग में भी बुनियादी व्यवस्था फेल हो जाए, तो मरीजों की ज़िंदगी और मृतकों की गरिमा दोनों पर खतरा मंडराता है।
हरिद्वार जैसे बड़े जिले में लचर व्यवस्था
हरिद्वार, जो उत्तराखंड का गढ़वाल प्रवेश द्वार है और जहां उत्तर प्रदेश से भी भारी आवाजाही होती है, वहां के जिला अस्पताल में बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं लगातार सवालों के घेरे में हैं। आबादी अधिक होने के साथ-साथ यहाँ दुर्घटनाओं और आकस्मिक मृत्यु के मामले भी अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। ऐसे में शवों के सुरक्षित रख-रखाव की जिम्मेदारी और भी गंभीर हो जाती है।लेकिन हकीकत यह है कि 19 शवों की क्षमता रखने वाले सभी डीप फ्रीज़र कई दिनों से बंद पड़े हैं। फिर भी अस्पताल प्रशासन मौन है।
टिन शेड के नीचे मोर्चरी, दुर्गंध से बेहाल परिसर
अस्पताल की मोर्चरी एक टिन शेड के नीचे चल रही है, जो किसी भी मानक के अनुरूप नहीं है। गर्मी में शवों से दुर्गंध उठना स्वाभाविक है, लेकिन जब उन्हें सुरक्षित रखने के लिए कोई सुविधा ही न हो, तो स्थिति विकराल हो जाती है।
यह दुर्गंध पूरे अस्पताल परिसर में फैल चुकी है और मरीजों, तीमारदारों के साथ-साथ डॉक्टर और कर्मचारी भी इससे परेशान हैं।
प्रशासन ने अस्पताल को घोषित किया निष्प्रयोज्य, पर वैकल्पिक मोर्चरी अब तक अधूरी
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने पहले ही जिला अस्पताल को ‘निष्प्रयोज्य’ घोषित कर दिया था, और यह तय किया गया था कि पोस्टमार्टम के लिए आने वाले शवों को मेडिकल कॉलेज, जगजीतपुर की नई मोर्चरी में शिफ्ट किया जाएगा।
लेकिन विडंबना यह है कि मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी का निर्माण अब तक अधूरा है और शव अभी भी उसी टिन शेड मोर्चरी में खुले में पड़े हैं।
डीप फ्रीज़र क्यों हैं ज़रूरी?
हरिद्वार के जिला अस्पताल में हर दिन औसतन तीन से चार शव पोस्टमार्टम के लिए आते हैं, जिनमें से कई शवों की पहचान तत्काल नहीं हो पाती है। ऐसे मामलों में शवों को तब तक डीप फ्रीज़र में रखा जाता है जब तक परिजन नहीं मिल जाते या कानूनी कार्रवाई पूरी नहीं हो जाती।
- भीषण गर्मी में खुले में रखा शव 24 घंटे में सड़ने लगता है, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
- पोस्टमार्टम से पूर्व शवों की शारीरिक स्थिति का सुरक्षित रहना आवश्यक होता है, जिससे मृत्यु के कारणों की पुष्टि में मदद मिलती है।
- अनपहचाने शवों के मामले में यह कानूनी आवश्यकता होती है कि उन्हें एक निश्चित समय तक सुरक्षित रखा जाए।
जिम्मेदारी तय नहीं, सवाल बाकी
सभी डीप फ्रीज़र के एक साथ खराब होने और उनकी मरम्मत की प्रक्रिया शुरू न होने पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है—जवाबदेही किसकी है?
क्या अस्पताल प्रशासन ने बार-बार खराब हो रहे उपकरणों की मरम्मत के लिए कोई अनुरोध भेजा?
क्या स्वास्थ्य विभाग को इस स्थिति की जानकारी थी?
और अगर थी, तो अब तक कोई समाधान क्यों नहीं निकाला गया?
अब क्या होना चाहिए?
- तत्काल प्रभाव से डीप फ्रीज़र की मरम्मत या वैकल्पिक फ्रीज़र की व्यवस्था होनी चाहिए।
- जगजीतपुर स्थित मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी को जल्द से जल्द चालू किया जाना चाहिए।
- लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए।
- प्रदेश स्तर पर मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित हो जिससे अस्पतालों में इस तरह की व्यवस्थाओं का नियमित ऑडिट हो सके।
निष्कर्ष: यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह मानवीय गरिमा का अपमान है
अस्पताल केवल जीवन बचाने का स्थान नहीं है, बल्कि वहां मृत्यु के बाद भी सम्मानपूर्वक व्यवहार अपेक्षित होता है। हरिद्वार जिला अस्पताल में हुई यह लापरवाही केवल प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि मृतकों की गरिमा और मानवाधिकारों का उल्लंघन है। अगर अब भी इस पर कार्रवाई नहीं होती, तो भविष्य में किसी और को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।