उत्तराखंड की चारधाम यात्रा आस्था, परंपरा और प्रकृति का अद्भुत संगम है। हर साल लाखों श्रद्धालु हिमालय की कठिन चोटियों और घाटियों को पार कर भगवान के दर्शनों के लिए आते हैं। लेकिन जैसे ही ठंड का मौसम दस्तक देता है, हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी और कठिन मौसम की वजह से धामों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इस बार भी गंगोत्री और यमुनोत्री धाम की शीतकालीन यात्रा की तारीखें तय हो गई हैं।
कपाट बंद होने की तारीखें
- गंगोत्री धाम: कपाट 22 अक्तूबर को अन्नकूट पर्व के दिन सुबह 11:36 बजे विधि-विधान के साथ बंद किए जाएंगे।
- यमुनोत्री धाम: कपाट 23 अक्तूबर को भैयादूज के दिन श्रद्धालुओं के लिए बंद होंगे।
मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल ने जानकारी दी कि गंगोत्री धाम का मुहूर्त नवरात्र की अष्टमी पर तीर्थ पुरोहितों द्वारा तय किया गया है, जबकि यमुनोत्री का शुभ मुहूर्त नवमी को निश्चित किया जाएगा। यह परंपरा हर साल नवरात्र के दौरान निभाई जाती है।
शीतकालीन पूजा की व्यवस्था
गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने के बाद मां गंगा की मूर्ति को पारंपरिक ढंग से मुखबा गांव स्थित गंगा मंदिर ले जाया जाएगा। यहां पूरे शीतकाल में श्रद्धालु पूजा-अर्चना और दर्शन कर सकेंगे।
इसी प्रकार, यमुनोत्री धाम की मूर्तियां शीतकाल के लिए खरसाली गांव लाई जाएंगी। वहां पर भी शीतकालीन पूजन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इन स्थानों को स्थानीय लोग और श्रद्धालु शीतकालीन चारधाम कहते हैं।
परंपरा और आस्था से जुड़ा महत्व
हिमालयी धामों के कपाट हर साल अक्टूबर-नवंबर में बंद हो जाते हैं क्योंकि इस अवधि के बाद यहां भारी बर्फबारी शुरू हो जाती है। कठोर सर्दी और दुर्गम रास्तों की वजह से इन मंदिरों तक पहुँचना असंभव हो जाता है। लगभग छह महीने तक ये धाम बर्फ की चादर में ढंके रहते हैं।
इसके बाद, वसंत ऋतु में अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर कपाट पुनः खोले जाते हैं और यात्रा का नया अध्याय शुरू होता है।
निष्कर्ष
गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट बंद होने की घोषणा हर साल श्रद्धालुओं के लिए भावुक क्षण होता है। यह केवल पूजा-अर्चना का अंत नहीं बल्कि हिमालय के कठोर मौसम की शुरुआत का संकेत भी है। श्रद्धालु अब अगले वर्ष अक्षय तृतीया का इंतजार करेंगे, जब फिर से चारधाम यात्रा के साथ आस्था का नया अध्याय शुरू होगा।
आस्था, परंपरा और प्रकृति के इस अद्भुत मेल को सुरक्षित और जीवंत रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।