उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। खासकर यूकेएसएसएससी (उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) के पेपर लीक कांड ने राज्य की भर्ती प्रणाली को गहरे संकट में डाल दिया है। इसी बीच आयोग ने एक बड़ा कदम उठाते हुए 5 अक्टूबर को प्रस्तावित सहकारी निरीक्षक वर्ग-2 और सहायक विकास अधिकारी (सहकारिता) की परीक्षा को स्थगित करने का निर्णय लिया है।
क्यों रद्द की गई परीक्षा?
आयोग के सचिव डॉ. शिव बरनवाल ने जानकारी दी कि यह फैसला अभ्यर्थियों के फीडबैक और सुरक्षा इंतज़ामों की कमी को देखते हुए लिया गया। हाल के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया था कि परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह सुरक्षित बनाने में अभी और तैयारी की आवश्यकता है।
कई अभ्यर्थियों ने भी लिखित रूप से आयोग से अनुरोध किया था कि जब तक पारदर्शी और सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित न हो, तब तक परीक्षा आयोजित न की जाए। आयोग का कहना है कि नई तिथि का ऐलान जल्द किया जाएगा।
नकल माफिया पर सरकार का शिकंजा
पेपर लीक प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि राज्य की भर्तियों में नकल माफिया कितने संगठित तरीके से सक्रिय हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून में घोषणा की कि अब ऐसी घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाने के लिए प्रदेश में मजबूत निगरानी समितियां बनाई जाएंगी।
इन समितियों में भर्ती आयोग के प्रतिनिधियों के साथ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होंगे। खास बात यह है कि इसमें युवाओं को भी जगह दी जाएगी ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही और अधिक सुनिश्चित हो सके।
आयोग की सफाई और तकनीकी खामियां
पेपर लीक मामले में आयोग ने अपनी सफाई दी है। उनका कहना है कि परीक्षा केंद्र पर जैमर सक्रिय था, ताकि मोबाइल या इंटरनेट का उपयोग न हो सके। वहीं, परीक्षा कक्ष में लगे सीसीटीवी कैमरे शुचिता और गोपनीयता की वजह से बंद किए जाते हैं।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है – जब कैमरे बंद होते हैं और उनकी एक्सेस कई लोगों के पास होती है, तो क्या यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देता? आयोग ने दावा किया कि ओएमआर शीट खाली छोड़ने जैसी घटनाएं किसी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने का माध्यम नहीं हैं, लेकिन जनता और अभ्यर्थी अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
नकलरोधी कानून और सरकार की सख्ती
मुख्यमंत्री धामी ने याद दिलाया कि उनकी सरकार ने देश का सबसे सख्त नकलरोधी कानून लागू किया है। इसी कानून के तहत कई बार तुरंत कार्रवाई भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि कानून बनने के बावजूद अगर पेपर लीक हो रहे हैं, तो फिर व्यवस्था में खामी कहां है?
धामी ने यह भी कहा कि आने वाले समय में निगरानी समितियों में युवाओं की भागीदारी से समन्वित प्रयास होंगे और नकल माफिया को पूरी तरह खत्म करना आसान हो जाएगा।
क्षेत्रीय प्रभाव और बेरोजगार युवाओं की नाराजगी
पेपर लीक कांड से सबसे ज्यादा प्रभावित वे बेरोजगार युवा हैं जो वर्षों से नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। पहाड़ी इलाकों से परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में युवाओं को पहले ही कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब जब पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो उनका विश्वास टूटना स्वाभाविक है।
मेरी नज़र में, यह सिर्फ एक भर्ती परीक्षा का मामला नहीं है, बल्कि युवाओं के भविष्य और आत्मविश्वास का सवाल है। उत्तराखंड जैसे छोटे और सीमित संसाधनों वाले राज्य में बार-बार होने वाली गड़बड़ियां यहां के युवाओं के पलायन को और तेज कर सकती हैं।
निष्कर्ष
यूकेएसएसएससी द्वारा 5 अक्टूबर की परीक्षा रद्द करने का फैसला भले ही अस्थायी राहत जैसा लगे, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि अब आयोग भी स्थिति की गंभीरता को समझ चुका है। सरकार निगरानी समितियां बनाने और नकलरोधी कानून को और कड़ा करने की बात कर रही है, जो स्वागतयोग्य कदम है।
फिर भी, असली चुनौती यह होगी कि इन प्रयासों को जमीन पर कितना ईमानदारी से लागू किया जाता है। उत्तराखंड के युवाओं को आज केवल नौकरियों की नहीं, बल्कि पारदर्शी और सुरक्षित भर्ती प्रक्रिया की सबसे ज्यादा जरूरत है।