उत्तराखंड के पहाड़ बार-बार यह साबित कर रहे हैं कि यहां प्राकृतिक आपदाएं कितनी भयावह हो सकती हैं। ताजा मामला उत्तरकाशी जिले के धराली गांव का है, जहां 5 अगस्त को आई भीषण बाढ़ ने दर्जनों परिवारों की जिंदगी तबाह कर दी। इस आपदा में कई लोग हमेशा के लिए लापता हो गए। सरकार अब उन परिवारों के घावों पर मरहम लगाने की कोशिश कर रही है।
केंद्र सरकार जल्द ही एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी कर सकती है, जिसके तहत लापता लोगों को सात साल तक इंतजार करने के बजाय जल्द ही मृत घोषित किया जा सकेगा। यह वही राहत है जो वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की रैणी आपदा में दी गई थी।
धराली आपदा का दर्दनाक मंजर
5 अगस्त की दोपहर लगभग पौने दो बजे धराली क्षेत्र में बादल फटने और अतिवृष्टि के कारण अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई।
- उत्तरकाशी जिले में 19 लोगों की जान गई।
- 22 लोग घायल हुए।
- कुल 76 लोग लापता हैं, जिनमें से 67 सिर्फ धराली से हैं।
हालांकि, प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर अब तक सिर्फ दो लोगों की मृत्यु की पुष्टि की है। बाकी लापता लोगों के परिजनों का कहना है कि इतने दिनों बाद भी जब उनके प्रियजन नहीं मिले, तो उनके जीवित लौटने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी है।
कानूनी पेच और परिवारों की मजबूरी
मौजूदा कानून, यानी भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 के अनुसार, किसी लापता व्यक्ति को सात साल पूरे होने के बाद ही कानूनी रूप से मृत माना जाता है। यही नियम इन आपदाग्रस्त परिवारों के लिए दोहरी मार बन जाता है।
- मुआवजा वितरण में देरी होती है।
- मृत्यु प्रमाणपत्र न मिलने से संपत्ति का हस्तांतरण रुक जाता है।
- बीमा क्लेम और पेंशन जैसी सुविधाएं अटक जाती हैं।
- सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता।
यानी, आपदा में अपना सबकुछ खो चुके परिवार को आर्थिक और कानूनी परेशानियों का लंबा बोझ झेलना पड़ता है।
सरकार का प्रस्ताव और उम्मीद
उत्तराखंड सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा है कि धराली आपदा पीड़ितों को भी वही राहत दी जाए जो केदारनाथ और रैणी आपदा के पीड़ित परिवारों को दी गई थी। सचिव स्वास्थ्य डॉ. आर. राजेश कुमार ने जानकारी दी कि यह प्रस्ताव रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया को भेजा गया है।
साथ ही, सचिव आपदा प्रबंधन विभाग विनोद कुमार सुमन का कहना है कि प्रस्ताव मंजूर होते ही लापता लोगों के परिजनों को सरकारी सहायता मिलना आसान हो जाएगा।
क्यों जरूरी है त्वरित राहत?
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में आपदा सिर्फ जानमाल का नुकसान नहीं करती, बल्कि पीढ़ियों तक का संघर्ष छोड़ जाती है। यहां के लोग ज्यादातर कृषि, पर्यटन और छोटे व्यापार पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में परिवार के मुखिया या कमाने वाले सदस्य के लापता होने पर पूरा घर आर्थिक संकट में डूब जाता है।
अगर नियमों में ढील मिलती है, तो:
- पीड़ित परिवारों को जल्दी मुआवजा मिलेगा।
- बीमा और बैंकिंग से जुड़े मामले सुलझेंगे।
- बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए आर्थिक मदद मिल सकेगी।
निष्कर्ष
धराली आपदा ने एक बार फिर उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया है। यदि केंद्र सरकार SOP जारी कर देती है, तो यह कदम न केवल धराली के पीड़ितों बल्कि आने वाले समय में अन्य आपदाओं से जूझ रहे परिवारों के लिए भी जीवन रक्षक साबित होगा।
यह सिर्फ आर्थिक मदद का मामला नहीं है, बल्कि उन परिवारों को सम्मान और सुरक्षा देने का प्रयास है, जिनकी दुनिया एक पल में उजड़ गई।