उत्तराखंड के एम्स ऋषिकेश से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है जिसने न केवल स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि करोड़ों की सरकारी राशि की बर्बादी भी उजागर की है। कार्डियोलॉजी विभाग के लिए बनाई जा रही कोरोनरी केयर यूनिट (CCU) पर लगभग 8 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन यह यूनिट कभी चालू ही नहीं हो पाई।
अब इस पूरे प्रकरण में सीबीआई ने जांच शुरू कर दी है और पूर्व निदेशक समेत तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
मामला क्या है?
साल 2017 में एम्स ऋषिकेश ने 16 बेड की सीसीयू यूनिट बनाने के लिए टेंडर जारी किया। यह यूनिट हृदय रोगियों के लिए एक अत्याधुनिक सुविधा होनी थी, जिससे आपातकालीन स्थिति में मरीजों को त्वरित इलाज मिल सके। लेकिन हकीकत में इस परियोजना पर 8.08 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद यूनिट एक दिन भी काम नहीं कर पाई।
टेंडर और आपूर्ति में गड़बड़ी
आरोप है कि 5 दिसंबर 2017 को जारी टेंडर दिल्ली की कंपनी एमएस प्रो मेडिक डिवाइसेस को दिया गया। कंपनी ने 2019-2020 में दो किस्तों में उपकरणों की आपूर्ति की और इसके बदले में भुगतान भी कर दिया गया। लेकिन जांच में सामने आया कि —
- कई उपकरण घटिया गुणवत्ता के थे।
- कुछ सामान स्पेसिफिकेशन के अनुसार नहीं था।
- कई उपकरण गायब मिले।
- सबसे चौंकाने वाली बात, टेंडर की पूरी फाइल ही गायब हो गई।
सीबीआई की जांच
26 मार्च को सीबीआई और एम्स अधिकारियों की संयुक्त टीम ने जांच की और इन गड़बड़ियों की पुष्टि की। इसके बाद 26 सितंबर को सीबीआई की एसीबी देहरादून यूनिट ने एफआईआर दर्ज की। इसमें पूर्व निदेशक डॉ. रविकांत, पूर्व खरीद अधिकारी डॉ. राजेश पसरीचा, और पूर्व स्टोर कीपर रूप सिंह के नाम शामिल हैं। इनके अलावा अज्ञात सरकारी कर्मियों और निजी लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ है।
प्रदेश के लिए बड़ा झटका
एम्स ऋषिकेश उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत के मरीजों के लिए एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है। यहाँ से लोगों को आधुनिक सुविधाओं और विशेषज्ञ इलाज की उम्मीद रहती है। लेकिन जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सीसीयू जैसी महत्वपूर्ण यूनिट मरीजों तक लाभ पहुंचाने से पहले ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाए, तो यह प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहरी चोट है।
बार-बार क्यों दोहराए जाते हैं ऐसे घोटाले?
यह पहला मामला नहीं है जब किसी मेडिकल प्रोजेक्ट में धांधली हुई हो। अक्सर देखा गया है कि बड़े संस्थानों में टेंडर और खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार पनपता है। कमीशनखोरी और जवाबदेही की कमी से ऐसी घटनाएं जन्म लेती हैं। सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बावजूद समय रहते निगरानी क्यों नहीं की गई?
निष्कर्ष
एम्स ऋषिकेश का यह घोटाला स्वास्थ्य सेवाओं की साख पर गहरा धब्बा है। सरकार और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि इस प्रकरण को किसी भी हाल में दबने न दें। साथ ही, ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने की ठोस व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि भविष्य में जनता के पैसे और उनकी उम्मीदों के साथ खिलवाड़ न हो।