NATO मेंबरशिप के भरोसे मत रहना; कतर के बाद तुर्की होगा इजरायल का अगला टारगेट? क्यों चर्चे

Rishab Gusain
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मध्य-पूर्व का माहौल एक बार फिर तनावपूर्ण होता जा रहा है। कतर पर हालिया इज़रायली हमलों और उसके बाद उठे अंतरराष्ट्रीय विरोध के बीच अब चर्चाएं तेज़ हो गई हैं कि इज़रायल का अगला टारगेट तुर्की हो सकता है। इस अटकल को हवा दी है वॉशिंगटन स्थित अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल रुबिन ने। उन्होंने कहा कि तुर्की अगर यह सोच रहा है कि उसकी नाटो सदस्यता उसे बचा लेगी, तो यह उसकी गलतफहमी है।

कतर के बाद तुर्की पर आरोप

कतर लंबे समय से इज़रायल के निशाने पर रहा है क्योंकि उस पर हमास को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं। अब यही आरोप तुर्की पर भी लगाए जा रहे हैं।

  • इज़रायली खुफिया एजेंसियों का दावा है कि हमास के कुछ प्रमुख कमांडरों ने तुर्की में शरण ली है।
  • प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा है कि आतंकियों को आश्रय देने वाला कोई भी देश बख्शा नहीं जाएगा।”
  • सोशल मीडिया पर इज़रायली विद्वानों और रणनीतिकारों ने भी लिखा – “आज कतर, कल तुर्की।”

यह बयानबाज़ी केवल कूटनीतिक शब्दजाल नहीं है, बल्कि आने वाले समय में क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर गहरा असर डाल सकती है।

तुर्की की कड़ी प्रतिक्रिया

तुर्की इन आरोपों को सिरे से खारिज करता आया है। राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन के सलाहकार ने इज़रायल पर तीखा हमला बोला और यहां तक कह दिया – “जल्द ही इज़रायल दुनिया के नक्शे से मिट जाएगा।”

दरअसल तुर्की और इज़रायल के बीच तनाव नया नहीं है।

  • तुर्की खुद को लंबे समय से फिलिस्तीन का बड़ा समर्थक बताता रहा है।
  • इज़रायल का मानना है कि पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्की उसकी सुरक्षा और ऊर्जा हितों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।
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नाटो सदस्यता भी ढाल नहीं?

माइकल रुबिन का तर्क है कि तुर्की अगर यह सोचता है कि नाटो की सदस्यता उसे इज़रायल या अमेरिका के गुस्से से बचा लेगी, तो यह उसकी भूल है।

  • नाटो मूलतः रूस और यूरोप के बीच की सुरक्षा गठबंधन है।
  • अगर तुर्की आतंकवाद समर्थक गतिविधियों में शामिल पाया गया, तो नाटो की सदस्यता भी उसे राजनीतिक सुरक्षा नहीं दिला पाएगी।

यहां गौर करने वाली बात है कि तुर्की नाटो का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य बल रखता है। ऐसे में यदि कभी इज़रायल-तुर्की टकराव हुआ तो यह केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं होगा, बल्कि पूरा मध्य-पूर्व और पश्चिमी गठबंधन इसमें खिंच सकता है।

बड़े युद्ध का खतरा

विश्लेषकों का मानना है कि यदि इज़रायल ने वास्तव में तुर्की को निशाना बनाया, तो यह पूरे क्षेत्र को भीषण युद्ध की ओर धकेल सकता है।

  • सीरिया में पहले से ही इज़रायल की सक्रियता है।
  • कतर और तुर्की जैसे देशों पर दबाव बढ़ने से अरब जगत और इस्लामिक देशों में नया ध्रुवीकरण शुरू हो सकता है।
  • अमेरिका और यूरोप भी ऐसी स्थिति से चिंतित होंगे क्योंकि इससे ऊर्जा सप्लाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा।

निष्कर्ष

कतर पर हमला और तुर्की को लेकर बढ़ती बयानबाज़ी संकेत देती है कि इज़रायल अब अपने दुश्मनों की सूची लंबी कर रहा है। लेकिन सवाल यही है कि क्या यह रणनीति उसे और सुरक्षित बनाएगी, या फिर पूरे क्षेत्र को अस्थिरता और युद्ध की आग में झोंक देगी?
दुनिया इस वक्त पहले से ही यूक्रेन युद्ध और एशिया-प्रशांत तनाव से जूझ रही है। ऐसे में अगर तुर्की और इज़रायल आमने-सामने आते हैं, तो यह निश्चित रूप से 21वीं सदी के सबसे बड़े संघर्षों में से एक साबित हो सकता है।

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Rishab Gusain is a Digital Marketing Executive and skilled content writer from Dehradun, Uttarakhand. With experience working for several national and international brands, he has helped businesses achieve remarkable organic growth through his strategic digital marketing approach. Deeply connected to his roots, Rishab is passionate about showcasing the rich culture, travel destinations, and traditions of Uttarakhand. His engaging content has attracted a growing readership, hitting over 10,000 visits in just two months.
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