उत्तराखंड की ऊँची चोटियों पर बसा विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ भगवान विष्णु के दर्शन करने आते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सर्दियों की दस्तक होती है, बर्फबारी और खराब मौसम के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
इस साल भी कपाट बंद करने की तारीख तय हो गई है।
कब बंद होंगे कपाट?
गुरुवार को पुरोहितों और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की बैठक में निर्णय लिया गया कि 25 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 56 मिनट पर बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे।
- इसके साथ ही श्रद्धालुओं के लिए इस पावन धाम में दर्शन का अवसर लगभग दो महीनों के लिए ही शेष रह गया है।
- इसके बाद भगवान बदरीनाथ की पूजा शीतकालीन गद्दी स्थल जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में की जाएगी।
अन्य धामों की स्थिति
बदरीनाथ के अलावा, उत्तराखंड के अन्य धामों के कपाट बंद होने की तिथियाँ भी पहले घोषित हो चुकी हैं।
- गंगोत्री धाम के कपाट 22 अक्टूबर को अन्नकूट पर्व के दिन सुबह 11:36 बजे बंद होंगे।
- यमुनोत्री धाम के कपाट अगले दिन 23 अक्टूबर को भैया दूज पर बंद होंगे।
- अब बदरीनाथ की घोषणा के साथ चार धामों में से तीन की तिथियाँ स्पष्ट हो चुकी हैं।
केदारनाथ धाम की कपाट बंद होने की तिथि भी जल्द घोषित होने की संभावना है।
क्यों बंद होते हैं कपाट?
उत्तराखंड के ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में नवंबर से भारी बर्फबारी शुरू हो जाती है। बदरीनाथ धाम समुद्र तल से लगभग 10,279 फीट (3,133 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ का तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है और सड़कें भी बर्फ से ढक जाती हैं।
ऐसे हालात में श्रद्धालुओं का पहुँचना असंभव हो जाता है। इसी कारण परंपरा के अनुसार, धाम के कपाट हर साल शीतकाल में बंद कर दिए जाते हैं।
आस्था और परंपरा
बदरीनाथ धाम की खासियत यह है कि कपाट बंद होने के बाद भी भक्त निराश नहीं होते। दरअसल, भगवान बदरीनाथ की पूजा शीतकाल में जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में होती है। भक्त वहाँ जाकर दर्शन कर सकते हैं और यह मान्यता है कि पूजा का फल उतना ही शुभ होता है जितना बदरीनाथ धाम में।
निष्कर्ष
25 नवंबर 2025 को बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद हो जाएंगे। इसके साथ ही श्रद्धालुओं के लिए दर्शन का यह सालाना अवसर खत्म हो जाएगा। यदि आप भगवान बदरीनाथ के दर्शन करना चाहते हैं, तो आने वाले दिनों का पूरा लाभ उठाइए।
बदरीनाथ धाम की यह परंपरा हमें यह भी याद दिलाती है कि हिमालय सिर्फ श्रद्धा का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति की कठिनाइयों और उसकी गोद में बसने वाली संस्कृति का प्रतीक भी है।