Uttarakhand Cloudburst: उत्तराखंड में बादल फटने से तबाही: चार जिलों में भारी नुकसान, तीन की मौत, कई लापता

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उत्तराखंड में एक बार फिर भारी बारिश और बादल फटने ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और बागेश्वर जिलों में बादल फटने की घटनाओं से तबाही मची है। अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग लापता हैं और कई मवेशी मलबे में दब गए हैं।

रुद्रप्रयाग में सबसे बड़ा नुकसान
रुद्रप्रयाग जिले के टेंडवाल गांव में बादल फटने से बड़ा हादसा हुआ। यहां मलबे में दबकर एक महिला की मौत हो गई और 18 से 20 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। बचाव दल मौके पर पहुंच चुके हैं, लेकिन लगातार बारिश और टूटी सड़कों की वजह से राहत कार्य धीमी गति से चल रहा है।

चमोली का देवाल ब्लॉक प्रभावित
चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में भी बादल फटने की घटना सामने आई। यहां लगभग 20 मवेशी मलबे में दब गए, जबकि एक दंपति लापता है। चमोली वैसे भी बारिश और भूस्खलन से प्रभावित इलाका माना जाता है, जहां हर साल बरसात में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती हैं।

टिहरी में गनीमत
टिहरी जिले के भिलंगना ब्लॉक में भी बादल फटा, लेकिन यहां गनीमत रही कि किसी की जान नहीं गई। हालांकि खेत और रास्तों को नुकसान पहुंचा है, जिससे ग्रामीणों की दिक्कतें बढ़ गई हैं।

बागेश्वर के पौसारी गांव में दो महिलाओं की मौत
बागेश्वर जिले के पौसारी गांव में शुक्रवार को बादल फटने से भारी नुकसान हुआ। एक घर भूस्खलन की चपेट में आ गया, जिसमें दो महिलाओं—बसंती देवी और बछुली देवी—की मौत हो गई। इस घटना में तीन लोग अब भी लापता हैं, जिनमें रमेश चंद्र जोशी, गिरीश चंद्र और पूरन चंद्र शामिल हैं। मौके पर विधायक सुरेश गढ़िया और डीएम आशीष भटनागर पहुंचे और राहत कार्य का जायजा लिया।

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प्रशासन और राहत कार्य
चारों जिलों में प्रशासन और आपदा प्रबंधन दल राहत और बचाव कार्य में जुटे हैं। SDRF और पुलिस की टीमें लगातार सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। प्रभावित गांवों में सुरक्षित स्थानों पर लोगों को भेजा जा रहा है।

स्थानीय पृष्ठभूमि और मेरा दृष्टिकोण
यह क्षेत्र (चमोली, रुद्रप्रयाग और बागेश्वर) उत्तराखंड की प्राकृतिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बेल्ट है। यही मार्ग बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थों तक जाता है। लेकिन यही इलाके हर बरसात में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
मेरा मानना है कि केवल राहत और बचाव से बात नहीं बनेगी। इन इलाकों में अर्ली वार्निंग सिस्टम, सुरक्षित पुनर्वास और वैकल्पिक सड़क मार्गों का निर्माण बेहद जरूरी है। स्थानीय लोग हर साल इसी त्रासदी से जूझते हैं—फसलें बर्बाद होती हैं, घर ढह जाते हैं और पलायन बढ़ता है।

निष्कर्ष
उत्तराखंड का मानसून हर बार चेतावनी देता है कि पहाड़ संवेदनशील हैं। इस बार फिर बादल फटने की घटनाओं ने दर्जनों परिवारों को उजाड़ दिया। अब समय है कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर इन आपदाओं के स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएं, वरना हर साल यही दर्दनाक तस्वीर दोहराई जाएगी।

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